मुझे आज भी अच्छे से याद है , 1986 के अगस्त के महीने में मैं और दादा जी धान कि फसल की नीलगाय से रखवाली करने के लिए खेत में रात को माच ( मचान ) पे सोए थे , तभी विविध भारती के प्रसारण पे यह गाना बजना शुरू हुआ , लेकिन फ्रीक्विंसी सही नहीं होने के कारण गाना सही से नहीं आ रहा था , उस समय हमारे गांव बिजली नहीं आती थी , गाना का फ्रीक्वेंसी सही से पकड़े और गाना शुद्ध रूप से आए इसके लिए दादा जी पूरे खेत का चक्कर लगा लाए , तभी नीलगाय घुस गए खेत में , और थोड़ा सा धान भी खा लिए , जब वो आए तो मैं बोला दादा जी नीलगाय आए थे , खेत में तो वो बोले जाने दो वो भी उसी ईश्वर की संतान है जिनके हम है , उनका भी तो थोड़ा हक बनता है , और मज़े की बात ये थी कि वो इस बात से खुश थे की गाने की 2 लाइन और याद कर लिए थे । आज ना तो दादाजी है , ना धान का खेत है , ना नीलगाय है , और ना ही अब फिल्मों में ऐसे मधुर संगीत है । हम इस बदलते समाज के अंतिम पीढ़ी होंगे जिन्होंने अपनी संस्कृति को अच्छे से जिया आज तो बस दिखावा रह गया है ।
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