ना जाने कितने लटके थे फांसी पर कितनो ने खाई थी गोलिया। क्यों झूट बोलते हो साहब , की चरखे से आज़ादी आयी थी।
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ना जाने कितने लटके थे फांसी पर कितनो ने खाई थी गोलिया। क्यों झूट बोलते हो साहब , की चरखे से आज़ादी आयी थी।